जब देश का भविष्य खतरे में हो, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना, हथियार या सीमाएं नहीं, बल्कि उसकी युवा पीढ़ी होती है। यही युवा भविष्य में सैनिक बनते हैं, वैज्ञानिक बनते हैं, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, पुलिसकर्मी और देश के नीति-निर्माता बनते हैं। लेकिन यदि यही भविष्य नशे, अपराध, बेरोजगारी, खराब शिक्षा, सामाजिक हिंसा और नैतिक पतन की चपेट में आ जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—जब देश का भविष्य ही खतरे में हो, तो देश की सुरक्षा का जिम्मेदार कौन बनेगा?

देश की सुरक्षा केवल सीमा पर तैनात जवानों की जिम्मेदारी नहीं है। यह जिम्मेदारी परिवार, समाज, स्कूल, प्रशासन और सरकार सभी की है। यदि बच्चे और युवा सही शिक्षा, अच्छे संस्कार और सुरक्षित माहौल से वंचित रहेंगे, तो राष्ट्र की नींव कमजोर होगी।

आज नशे का बढ़ता जाल, सोशल मीडिया का दुरुपयोग, साइबर अपराध, हिंसा, और गलत संगत जैसी चुनौतियां युवाओं को प्रभावित कर रही हैं। दूसरी ओर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और खेल-सांस्कृतिक गतिविधियों की कमी भी कई युवाओं को भटकाव की ओर धकेल सकती है।

समाधान केवल कानून बनाने से नहीं निकलेगा। इसके लिए परिवारों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा, शिक्षण संस्थानों को केवल डिग्री नहीं बल्कि चरित्र निर्माण पर भी ध्यान देना होगा, समाज को सकारात्मक वातावरण देना होगा और सरकार को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य तथा नशामुक्ति जैसे क्षेत्रों में प्रभावी कदम उठाने होंगे।

एक सुरक्षित राष्ट्र की शुरुआत सुरक्षित और सशक्त युवा पीढ़ी से होती है। यदि हम आज अपने बच्चों और युवाओं को सही दिशा देने में सफल होते हैं, तो कल देश की सीमाएं भी सुरक्षित रहेंगी और लोकतंत्र भी मजबूत होगा।

इसलिए यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, बल्कि हम सभी से है—क्या हम अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं? क्योंकि जब देश का भविष्य सुरक्षित होगा, तभी देश की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

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